
सोशल मीडिया पर क्यों गरमाया नया विवाद?
भारत और नेपाल के सदियों पुराने “रोटी-बेटी के रिश्ते” के बीच समय-समय पर सीमा विवाद आड़े आता रहा है। इस बार किसी आधिकारिक कूटनीतिक नोट या सैन्य हलचल के कारण नहीं, बल्कि एक वायरल नेपाली लोकगीत के कारण सोशल मीडिया पर दोनों देशों के यूजर्स के बीच जंग छिड़ गई है।
इस गीत में नेपाल के पारंपरिक दावों (लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधूरा) से आगे बढ़कर उत्तराखंड के दो प्रमुख और स्थापित शहरों—टनकपुर (चंपावत जिला) और अल्मोड़ा को भी नेपाल की भूमि के रूप में प्रदर्शित किया गया है। वर्तमान में नेपाल के कुछ नेताओं के आक्रामक बयानों के बाद इस पुराने गीत को दोबारा हवा दी जा रही है।
इतिहास: केपी शर्मा ओली काल और 2020 का नया नक्शा
2019-20: भारत ने जब लिपुलेख दर्रे तक धारचूला-लिपुलेख लिंक रोड का उद्घाटन किया, तो नेपाल ने इस पर कड़ा विरोध जताया। नया राजनीतिक नक्शा: तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के कार्यकाल में नेपाल की संसद ने एक नया राजनीतिक नक्शा पास किया। इसमें भारत के नियंत्रण वाले कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधूरा (कुल 372 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र) को नेपाल के नक्शे में शामिल कर दिया गया था। भारत ने इस एकतरफा कदम को सिरे से खारिज कर दिया था।
क्या है मूल भारत-नेपाल सीमा विवाद? (सुगौली संधि का पेंच)
नेपाल का दावा है कि महाकाली (काली) नदी का वास्तविक उद्गम लिंपियाधूरा से होता है। इसलिए सुगौली संधि के तहत नदी के पूर्व का पूरा हिस्सा (जिसमें कालापानी और लिपुलेख भी आते हैं) नेपाल का भूभाग है।
भारत का रुख: भारत का स्पष्ट रुख है कि काली नदी का उद्गम कालापानी के पहाड़ों से होता है। भारत के पास इस क्षेत्र के सदियों पुराने प्रशासनिक और राजस्व रिकॉर्ड हैं, जो साबित करते हैं कि यह क्षेत्र उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का अभिन्न हिस्सा है। इसके अलावा, भारत की सुरक्षा के लिहाज से लिपुलेख दर्रा चीन सीमा पर एक अत्यंत रणनीतिक पोस्ट है.
टनकपुर और अल्मोड़ा पर दावे की सच्चाई
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तराखंड के टनकपुर और अल्मोड़ा को लेकर भारत और नेपाल सरकार के बीच कभी कोई कूटनीतिक या आधिकारिक विवाद नहीं रहा है। टनकपुर सीमावर्ती क्षेत्र जरूर है, लेकिन अल्मोड़ा तो उत्तराखंड के मध्य में स्थित एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर है।
गीत में इन शहरों का नाम शामिल करना केवल अति-राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़काने और प्रोपेगैंडा फैलाने का जरिया मात्र है। नेपाल सरकार ने भी कभी आधिकारिक तौर पर अल्मोड़ा या टनकपुर पर कोई दावा नहीं किया है।
क्या हो सकता है इसका असर?
विशेषज्ञों के अनुसार, यद्यपि यह केवल एक लोकगीत है और इसे नेपाल का आधिकारिक रुख नहीं माना जा सकता, लेकिन डिजिटल युग में ऐसी चीजें जनभावनाओं को भड़काने का काम करती हैं। उत्तराखंड के सीमांत इलाकों (जैसे पिथौरागढ़, चंपावत और धारचूला) में रहने वाले स्थानीय लोगों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। दोनों देशों के प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों को हवा देने के बजाय दोनों देशों को बातचीत के जरिए पुराने सीमा विवादों को सुलझाने पर ध्यान देना चाहिए।


